Thursday, November 27, 2008

गम-ऐ-जिंदगी

उनके दानिश-ए-हयात पर हम फ़ना हो गए,
फिल-हकीकत-ए-करम से जां-बलम हो गए।
वो समझे हम रुखसार-ए- हुस्न पर मर गए,
अब कौन समझाये उन्हें, वो क्या गुनाह कर गए।
ये दिल-ए-"अधूरा" हैं, इश्क-ए-अरमान मर गए,
हम समझते थे उन्हें संजीदा, वो रंग-ए-वफादार हो गए।
जौहर-ए-नगीने के पारखी जौहरी हो गए,
गुमान-ए-हुस्न सबाब, अब फौरी हो गए।
नांजा झूठे हुस्न-ओ-लुआब तुम्हारे चले गए,
और आई साथ निभाने की बारी तो आशिक-ए-हुजूम बिखर गए।

शेरगुल्ला

महबूब की मोहब्बत में "अधूरा" क्या से क्या हो गया,
निकला था घर से हट्टा-कट्टा, लौटा तो उल्लू का पट्ठा हो गया।

फ़ना

नाजा हूँ तेरे इश्क-ए-रुसवाई से
मैंने तो खुलूस-ए-हयात से की अकीदत
फ़ना होता हूँ तेरी दानिश-ए-रिवायत से
जो दी तुने तबियत-ए- दिल से अजीयत।

Wednesday, November 19, 2008



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Friday, November 14, 2008

वो अपना है या बेगाना???


वो अपना है या बेगाना, अच्छा लगता है ।
दो पल उसके साथ बिताना अच्छा लगता है ।
रोज बहाने कर के जाना अच्छा लगता है ।
एक झलक भी उसकी पाना अच्छा लगता है ।
उसकी बात अलग है वो मुझको कुछ भी कह ले ,
आशिक, पागल या दीवाना अच्छा लगता है ।
कहने को तो जब मैं चाहू वो हाँ कह देंगे,
लेकिन उनका कहना ना-ना अच्छा लगता है,
रिश्ता क्या है उससे मेरा,
ख्वाबों में भी उसका आना अच्छा लगता है ।
और क्या लिखूं उसके बारे में,
उसकी हर बात अच्छी लगती हैं,
कौन बताये उसे सचमुच वो मुझे इतनी अच्छी लगती है .

कुछ नहीं

फूल खिलते नहीं यूंही अब मेरे दामन में

की लग चुकी हैं आग एक बार इस चमन में

वो क्या सींचेगे प्यार की इस बगिया को

जो तोड़ लेते हैं अलसुबह फूलों को.

उनके लिए

जानते हैं दुनिया के रिवाजों को
पहचानते है उनके इरादों को ।
अनजाने बने रहते है दिखाने को
हम तो हँसते ही हैं उनको हँसानें को ।

चाहत

थी हमारे प्यार में कोई कमी
या नसीब ही खोटा था ।
हमने चाहा था उनके दिल में रहना
पर शायद वो घर ही छोटा था ।